"The Way in Madness"

       ऐसा भी तो हो सकता है कि  जिन रास्तों पर हमें मंजिल पा जाने का आभास हो, वे कहीं भी न जाते हों, और हमारा चलना सिर्फ हमारा भटकना हो।  
      इंसान के लक्ष्य इंसान से बड़े कैसे हो सकते  हैं। पर विडम्बना यह है की पूरी दुनिया में चल रहा है यही पागलपन। मनुष्य निर्माण की कथित प्रक्रियाओं में मनुष्य होने की भावना कहीं खो सी गयी है। हम जो दुनिया बना रहे हैं उसमे  इंसान मात्र उपकरण क्यों है। हमें ये ख्याल ही नही है कि  मंदिर के देवता की हम बनती हुई इमारत पर निरंतर बलि देते जा रहे हैं। कुछ पा लेने की होड़  है, कहीं पहुँच जाने की दौड़ है पर जो पहुँचने  वाला है, पाने वाला है उसके बचे रह जाने का हमें ख्याल तक नही। 
       कहतें हैं जीवन एक बाधा दौड़ है, जो ताकतवर है वही  पहुंचेगा शिखर पर। एक शिखर, फिर दूसरा .....तीसरा ....ऊँचा और ऊँचा .....और ....पर हर नए शिखर पर पहुँच जाने के बाद भी कुछ पाया हुआ सा 
क्यों नहीं लगता।  क्यों उम्र बढ़ने के साथ कुछ छूटते  जाने की अनुभूति सघन होती जाती है। बुढ़ापा बचपन को इतना कसकर क्यूँ पकड़ लेना चाहता है।  उसे वापिस पा  जाने की इतना लालसा क्यों जन्म ले लेती है। क्यों मन पीछे मुड़कर देखता रहता है बार- बार, बार-बार। कुछ तो गलत हो ही रहा है मनुष्य के साथ,  जीवन के प्रथम प्रहर  में दिख जाये तो गलती सुधारी जा सकती है। इतना तो सोचना बनता है ना कि


क्यों 
हर आँख में एक नमी सी है
सब कुछ है
पर कहीं तो कुछ कमी सी है 
उम्र बढती है 
तो साथ में अंधरे भी क्यों 
ये कमी के अहसास 
हमें घेरे हैं क्यों; 

ठोकरें बार बार 
याद  दिला जाती हैं 
मन फिर भी कहता है 
एक बार और सही,
सपने 
इतने ही सच होते 
तो 
इतने तो न होते आंसू 
न होती इतनी उदासी ही कहीं। 
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