मंगलवार, 10 जुलाई 2018

सागर पर पहरे हैं

सागर पर पहरे हैं,

सरिताएं आएंगीं 
अब
कहाँ जायेंगीं,
हर एक मुहाने पर
डेल्टा कुछ ठहरे हैं,

किससे मांगेंगी मदद 
अपने में सभी व्यस्त 
किस पर भरोसा करें 
चेहरे पर चेहरे हैं,

न गर्वित,
न कम्पित हैं 
शांत मंद मंथर ये, 
पत्थरों से जूझने के
जख्म बड़े गहरे हैं,

जीवन की संध्या पर
आश्रय का खोना भर
होता है कष्टप्रद,  
थकी मांदी लहरे हैं;

मुतमइन हैं कि 
आज बंधन हैं, दायरे हैं 
आगत अनिश्चित
पर स्वप्न तो सुनहरे हैं.


(मेरी पुरानी कविताओं में से एक )
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