मंगलवार, 10 जुलाई 2018

Online Diaries - 01

यही सुकून है मेरे लिए, यही तलाश और तलाश की मंजिल भी।
लिखने के लिए सबसे पहली शर्त है आलोचना से बचने की कोशिश से मुक्त होना।  
ये मुक्ति ही लिखने की दुनिया का पहला सबक है। 
इस सबक के साथ एक शुरुआत है ऑनलाइन डायरीज।
मुझे नहीं पता कि मुझे क्या लिखना है।  
कौन सा दिन कौन से अनुभवों और किस सबक के साथ ख़तम होगा।
शायद यही जिंदगी के बारे में भी कहा जा सकता है।
तफ़सीले वाक़यात तो नहीं लेकिन अपने जर्फ़ भर अपनी नज़्मे, कहानियां, और अपने शिकवे।


ये सपने, 
जो कहीं दूर से
लेने आ गए थे पनाह
सपनीली आँखों में,
कसमसाते हैं अब
जैसे मछलियां अक़्वेरियम में।

सागर पर पहरे हैं

सागर पर पहरे हैं,

सरिताएं आएंगीं 
अब
कहाँ जायेंगीं,
हर एक मुहाने पर
डेल्टा कुछ ठहरे हैं,

किससे मांगेंगी मदद 
अपने में सभी व्यस्त 
किस पर भरोसा करें 
चेहरे पर चेहरे हैं,

न गर्वित,
न कम्पित हैं 
शांत मंद मंथर ये, 
पत्थरों से जूझने के
जख्म बड़े गहरे हैं,

जीवन की संध्या पर
आश्रय का खोना भर
होता है कष्टप्रद,  
थकी मांदी लहरे हैं;

मुतमइन हैं कि 
आज बंधन हैं, दायरे हैं 
आगत अनिश्चित
पर स्वप्न तो सुनहरे हैं.


(मेरी पुरानी कविताओं में से एक )