रविवार, 27 दिसंबर 2015

"विलोम शब्द"



तुम नहीं थे, 
मैं नहीं जानती थी ख़ुशी,
पर अब,
कभी तुम्हारे न होने से,
जानती हूँ 
ख़ुशी के बिना
कुछ लम्हें;

तुम्हारे बिना 
मैं नहीं जानती थी 
'अकेलापन' 
पर तुम्हारे संग,
जानती हूँ 
कि इसका होना भी है;

रोती थी मैं जब कभी,
चुपके से, 
किसी तकिये पर
रख लेती थी सर,  
तुम नहीं थे जब,
तुम हो तो भी
रोती हूँ मैं, 
पर अब,
कमी महसूस होती है
किसी कंधे की सिरहाने;

विश्वास के मायने,
मैं जानती न थी
तुमसे पहले, 
पर तुम आ गए,
तो जानती हूँ 
अविश्वास का दुःख; 

जिंदगी के अर्थ,
यूँ तो कभी खोजे नहीं,
तुमसे पहले 
ज़िंदगी को सोचा न था, 
तुम आ गए तो अब 
ढूँढ़ती हूँ तुम्हारे बिना 
है जिंदगी कहाँ;

कितना और क्या होता है 
सम्पूर्ण होना,  
नहीं जानती थी मैं 
तुम्हारे आने से पहले, 
पर अब,
तुम्हारे चले जाने को 
कहती हूँ खालीपन;

मेरे,
कुछ शब्दों के अर्थ,
कभी मिले नहीं मुझे, 
और अब जो मिले,
वो हैं बस, 
उनके
'विलोम शब्द'।