रविवार, 13 दिसंबर 2015

"इसे,ये मीठा शहद, और है तीखी मिर्ची"

ये पूरे की मांग नहीं है,
न ही अधूरेपन की,
खलिश है,
न ही प्रार्थना,
न ही विनय है,


ये स्वाभाविक,
लेने-देने की रस्में हैं, 
होती ही हैं,
प्रीत अगर हो,
रीत नहीं फिर, 
कभी बांधती, 
ये बंधन फिर,
बंधते नहीं हैं, 
ले लेते हैं अंकपाश में, 
बड़े प्यार से,
मानोगे तो,
एक विश्वास भरी थपकी ने,
जग जीते हैं, 
माँ की हो या हो प्रियतम की, 
प्रेम नहीं कुछ फ़र्क़ माँगता, 
प्रेम अगर हो,
ये पानी सा,
तुम पर निर्भर, 
क्या आकार,
किसे देते हो, 

देते हो तो मिलता ही है, 
नहीं मगर ये 
'लेना -देना' 
किसी गणित का,
यहाँ चाँद  से भी बतियाते ,
पवन से हैं संदेशे जाते,
तुम्हें पता है?
नहीं पहेली, 
ये रहस्य है, 
हो जो जानना,
जीकर देखो, 
चखकर देखो,
पीकर देखो,
इसे, 
ये मीठा शहद,
और है तीखी मिर्ची।
    



ख़लिश= चुभन, पीड़ा