मंगलवार, 2 जून 2015

"अफ़साना-ए-जिंदगी"


कोई भी मंजिल 
मेरी मंज़िल न थी 
हर मंज़िल के करीब 
यही जाकर जाना,
अफ़साना-ए-जिंदगी 
बस एक
रास्ता लगती है मुझे। 

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जब लगता था 
कि कुछ नहीं है पास 
बहुत पाना था, 
आज सब पाने के बाद, 
याद बहुत 
आती है उसकी, 
जो खो बैठा हूँ।  

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जो अमूर्त है
वह नियम से परे है 
और समय से बाहर ,
ऐसा ही विचित्र है जीवनकर्म 
सिर्फ कोशिश से ही नहीं मिलता 
लेकिन करने को है 
सिर्फ कोशिश ही। 

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प्रीत के ये स्वप्न, 
बादल  हैं शरद के 
बरसकर भी नही प्यारे,
बिखरकर भी नही। 

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