रविवार, 20 दिसंबर 2015

'ब्याहता' और 'दहेज़'

    'ब्याहता'

मेरे लिए, 
फूल 
फूल नहीं है,
एक सपनीली लड़की की
निर्भार हँसी है,  
और... 
इसी तरह
जलता हुआ चूल्हा,
उठता हुआ धुँआ,
केवल धुआँ नहीं है, 
एक ब्याहता लड़की के,
सपनों का अलाव 
और जिंदगी का  हश्र है। 

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    'दहेज़' 

गाँठ भर गहनों, 
मांग भर सिन्दूर ,
हाथ भर चूड़ियों, 
और कुछ
सुन्दर कपड़ों के बदले, 
खरीद लिया तुमने मुझे,
और फिर... 
चुपके से मांग लिया 
मेरे पिछले रखवालों से 
मेरी
ताजिंदगी रखवाली का 'किराया' ;
यह सब देखकर 
मेरा हँसता हुआ चेहरा 
फ़क पड़ गया, 
और गाता  हुआ गला 
 भर आया। 




(2008  में लिखी मेरी कविताओं में से)
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