शनिवार, 7 नवंबर 2015

"इतना क्या उदास होना"


इतना क्या 
उदास होना;

ये लम्बे रास्ते  हैं, 
हैं मगर कुछ दूर तक ही, 
उम्र को यूँ अज़ल तक ढोना नहीं है, 
हर कुछ, तपे जो आग में, सोना नहीं है।  

यूँ पूरी किसी की होती नहीं हैं तमन्नायें,
इत्तिफ़ाक़न नहीं है ये ज़िन्दगी में 
काश होना; 
इतना क्या 
उदास होना; 

समझ के इन रास्तों पर,
क्या चले कोई, 
किनारों पर, कदम पर हर,
त-अज़्ज़ुब के शज़र हैं;

संजीदगी की जिंदगी के 
जिंदगी भर मायने क्या 
अपना यहाँ, जब एक भी कोना नहीं है 
जो होना था नहीं, होना नहीं है।  

ये  दुनिया है सराबों की, 
क्या हुआ जो तकलीफ देता है किसी से 
आस होना; 
इतना क्या 
उदास होना; 

करें किन रास्तों  का ज़िक्र,
कोई तो कहीं जाता नहीं,  
न  जाने किन मक़ामों की
ये दिल को आरज़ू सी है;

बड़े सहमे से, सिमटे से 
समेटे हैं खुदी को,
कुछ पा लिया है  क्या, कि जो खोना नहीं है  
किसी का भी ये तख़्त-ओ-ताज़ तो होना नहीं है। 

ये दरिया के किनारे भी, 
जो सूखे हैं  हलक, तो जानते हैं हम,
कि होता क्या है, 
प्यास होना; 
इतना क्या 
उदास होना;

हमें मालूम है जो आज पाते  हैं, 
वो खोना ही है आखिर 
हमें तो शौक है ये बस 
बनाने का, मिटाने का;

हम अपनी ही शमाँ से 
अपना ज़ाज़िब घर जलाते हैं, 
हमें  आतिश-जनों  में आग को बोना नहीं है  
ये हमने ठान रखा है कि बस रोना नहीं है। 

जो होना है तो बस इतना,
'उसी' की हाज़िरजवाबी का 
जवाब होना;
इतना क्या 
उदास होना। 

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