शुक्रवार, 26 जून 2015

"न गुज़रे अश्क़ से तो रास्ता क्या"



मेरे पास, 
तेरे आने से,
दिन ज्यादा हुआ, हुई रात कम,
इतना अतिरेक हुआ कहने को,
क़ि हुए लब चुप,
और हुई बात कम;

तू मुझमें अमानत-ए-जिंदगी की  आशा  प्रिय !
तू मुझमें प्रेम की परिभाषा प्रिय! 

जो कितनी बार
मुझमे ढूंढ़ा था,
वो तुझमें शिद्दतों से पाया है,
तेरे होने में,
मेरे होने की धुन है न, 
उसी ने धड़कनों में कोई गीत गाया  है;

अब इतना है तू मुझमें क़ि मैं ज़रा सा प्रिय! 
अब और क्या चाहतें करूँ  औ' क्या प्रत्याशा प्रिय! 

मेरी इक़्तिज़ा,
मेरा तसव्वुर तू है,
तमाम दुनिया से मुझको वास्ता क्या, 
वे कहते हैं- बहुत रोना होगा 
मैं  कहती हूँ-
न गुज़रे अश्क़ से तो रास्ता क्या;

इश्क तो है खलिश के बाद खियांबा सा प्रिय!
तबस्सुम  सी ये नज़्म है तसव्वुफ़  का भी है ये किस्सा प्रिय !



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