शुक्रवार, 26 जून 2015

"न गुज़रे अश्क़ से तो रास्ता क्या"



मेरे पास, 
तेरे आने से,
दिन ज्यादा हुआ, हुई रात कम,
इतना अतिरेक हुआ कहने को,
क़ि हुए लब चुप,
और हुई बात कम;

तू मुझमें अमानत-ए-जिंदगी की  आशा  प्रिय !
तू मुझमें प्रेम की परिभाषा प्रिय! 

जो कितनी बार
मुझमे ढूंढ़ा था,
वो तुझमें शिद्दतों से पाया है,
तेरे होने में,
मेरे होने की धुन है न, 
उसी ने धड़कनों में कोई गीत गाया  है;

अब इतना है तू मुझमें क़ि मैं ज़रा सा प्रिय! 
अब और क्या चाहतें करूँ  औ' क्या प्रत्याशा प्रिय! 

मेरी इक़्तिज़ा,
मेरा तसव्वुर तू है,
तमाम दुनिया से मुझको वास्ता क्या, 
वे कहते हैं- बहुत रोना होगा 
मैं  कहती हूँ-
न गुज़रे अश्क़ से तो रास्ता क्या;

इश्क तो है खलिश के बाद खियांबा सा प्रिय!
तबस्सुम  सी ये नज़्म है तसव्वुफ़  का भी है ये किस्सा प्रिय !



4 टिप्‍पणियां:

Rakesh Kaushik ने कहा…

"तबस्सुम सी ये नज़्म है"

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (28-06-2015) को "यूं ही चलती रहे कहानी..." (चर्चा अंक-2020) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

रचना दीक्षित ने कहा…

बेहतरीन भावों और शब्दों से सुसज्जित

abhi ने कहा…

Lovely...So Beautiful...!