मंगलवार, 2 जून 2015

"अफ़साना-ए-जिंदगी"


कोई भी मंजिल 
मेरी मंज़िल न थी 
हर मंज़िल के करीब 
यही जाकर जाना,
अफ़साना-ए-जिंदगी 
बस एक
रास्ता लगती है मुझे। 

************************ 

जब लगता था 
कि कुछ नहीं है पास 
बहुत पाना था, 
आज सब पाने के बाद, 
याद बहुत 
आती है उसकी, 
जो खो बैठा हूँ।  

************************

जो अमूर्त है
वह नियम से परे है 
और समय से बाहर ,
ऐसा ही विचित्र है जीवनकर्म 
सिर्फ कोशिश से ही नहीं मिलता 
लेकिन करने को है 
सिर्फ कोशिश ही। 

**************************

प्रीत के ये स्वप्न, 
बादल  हैं शरद के 
बरसकर भी नही प्यारे,
बिखरकर भी नही। 

***************************


5 टिप्‍पणियां:

Shah Nawaz ने कहा…

बहुत खूब!

rashmi savita ने कहा…

Thank You Sir!

शारदा अरोरा ने कहा…

वह नियम से परे है
और समय से बाहर ,
ऐसा ही विचित्र है जीवनकर्म
सिर्फ कोशिश से ही नहीं मिलता
लेकिन करने को है
सिर्फ कोशिश ही।
बहुत खूबसूरत लिखा है ,सत्य भी .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

यही सूक्ष्म उलझने जीवन को और गूढ़ बना देती हैं, उनका सुन्दर चित्रण।

abhi ने कहा…

Beautiful!!