रविवार, 1 जून 2014

"कुछ अटकाव, कुछ भटकाव"

कुछ अटकाव,
कुछ भटकाव 
पल -पल की 
किस्सागोई से 
दिन बनते हैं 
और अहर्निश 
हम जलते हैं 
अग्निशिखा में 
अपने मन की
किसी सपन की
राह जो पकड़ी 
कहीं अटकते 
कहीं भटकते 
फिर से शुरू 
शुरू करते से 
एक शून्य में 
लगा है चक्कर 
भरते गए 
बही खाते 
पर 
चक्र चलाकर 
धुरी जो खोई 
बिखरे सभी पत्र 
सांसों के,  
फिर 
हमने
धङकन को समझाया,
पहुचेंगे तो 
तू चलती रह, 
ये तो आते ही रहते हैं 

कुछ अटकाव,
कुछ भटकाव।