शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

"मगर मिटती नहीं"

तुम्हारे
मात्र होने से ही 
मन परितृप्त है, 
तबसे मगर, 
तुम तक राह कोई
है जो, 
फिर
दिखती रही

तुम्हारी 
अछूती, अदृश्य, अंजानी  
तरंगों में, 
महसूस करती हूँ
कि तुम हो 
और तुमसे, 
जागृत है मुझमें 
गुनगुनी धूप जाड़ों की 
शीतलता पहाड़ों की,

ये तुम में 
चाह  
ऐसी है कि 
उठ गयी है, मगर
गिरती नहीं ;

बोध का 
मात्र दीपक ही सही 
बनकर जले 
मुझे बाती बनाकर 
'मन' मेरा 
मुझमे पले, 
कि तुमसे 
मिलूं जब, 
मन 
खरा सोना बन सके, 
धैर्य के सांचों में 
अप्रतिम ढल सके, 

तुम, 
जानते तो होगे प्रिय! 
यह तुमसे ही मिली है 
प्यास, 
जो रह-रह कर
उमगती है 
मगर मिटती नहीं। 

7 टिप्‍पणियां:

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (01-11-2014) को "!! शत्-शत् नमन !!" (चर्चा मंच-1784) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर

jyoti savita ने कहा…

Ati uttam

saurabh singh ने कहा…

Touching the horizon of spirituality with love.....

Onkar ने कहा…

बहुत सुंदर

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

Behad umda..... Aabhaar !!