रविवार, 1 जून 2014

"कुछ अटकाव, कुछ भटकाव"

कुछ अटकाव,
कुछ भटकाव 
पल -पल की 
किस्सागोई से 
दिन बनते हैं 
और अहर्निश 
हम जलते हैं 
अग्निशिखा में 
अपने मन की
किसी सपन की
राह जो पकड़ी 
कहीं अटकते 
कहीं भटकते 
फिर से शुरू 
शुरू करते से 
एक शून्य में 
लगा है चक्कर 
भरते गए 
बही खाते 
पर 
चक्र चलाकर 
धुरी जो खोई 
बिखरे सभी पत्र 
सांसों के,  
फिर 
हमने
धङकन को समझाया,
पहुचेंगे तो 
तू चलती रह, 
ये तो आते ही रहते हैं 

कुछ अटकाव,
कुछ भटकाव।  


6 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-06-2014) को ""स्नेह के ये सारे शब्द" (चर्चा मंच 1631) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

jyoti savita ने कहा…

हमने
धङकन को समझाया,
पहुचेंगे तो
तू चलती रह,
ये तो आते ही रहते हैं

कुछ अटकाव,
कुछ भटकाव।


awesome...

Asha Saxena ने कहा…

सुन्दर भाव लिए रचना |

abhi ने कहा…

सच है...कुछ अटकाव कुछ भटकाव आते ही रहते हैं !

Digamber Naswa ने कहा…

इन्ही अटकाव और भटकाव के बीच जीवन भी चलता रहता है ... धुरी की परवाह क्यों कर ..

Yashwant Yash ने कहा…

कल 03/जून /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद !