शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

"कहाँ आया है मुझे"

 सुनकर रुकना 
कहाँ आया है मुझे;
 
तुम्हारे आवाह्न  पर
ठहर तो जाती हूँ सहसा
पर चलने लगती हूँ 
फिर फिर
उन्हीं राहों पर.… 
पर मुझे कहो,
कितना भी चलती हूँ 
ये रास्ते  मुझे यूँ 
अनजाने क्यों ? 

एक- एक लम्हे का 
अहसान मुझ पर है 
मैनें उस से बातें की  हैं 
समझा है उसे 
पर 
समझती हूँ जो 
वह नहीं करती 
और जो करती हूँ 
वह जाने  क्यों?

तुम पूछते रहे हो न मुझसे 
कि तुम्हारे बारे में कुछ कहूँ 
झिझकती हूँ 
कि आखिर 
मेरे बारे में ही 
कह सकना दुष्कर है मुझे,
जन्मी तो हूँ पर 
मेरे होने ने भी 
कहाँ पाया है मुझे, 

 सुनकर रुकना 
कहाँ आया है मुझे। 


 


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