शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

"कहाँ आया है मुझे"

 सुनकर रुकना 
कहाँ आया है मुझे;
 
तुम्हारे आवाह्न  पर
ठहर तो जाती हूँ सहसा
पर चलने लगती हूँ 
फिर फिर
उन्हीं राहों पर.… 
पर मुझे कहो,
कितना भी चलती हूँ 
ये रास्ते  मुझे यूँ 
अनजाने क्यों ? 

एक- एक लम्हे का 
अहसान मुझ पर है 
मैनें उस से बातें की  हैं 
समझा है उसे 
पर 
समझती हूँ जो 
वह नहीं करती 
और जो करती हूँ 
वह जाने  क्यों?

तुम पूछते रहे हो न मुझसे 
कि तुम्हारे बारे में कुछ कहूँ 
झिझकती हूँ 
कि आखिर 
मेरे बारे में ही 
कह सकना दुष्कर है मुझे,
जन्मी तो हूँ पर 
मेरे होने ने भी 
कहाँ पाया है मुझे, 

 सुनकर रुकना 
कहाँ आया है मुझे। 


 


4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (15-02-2014) को "शजर पर एक ही पत्ता बचा है" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1524 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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अलविदा प्रेमदिवस।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

चलना, रुकना, नियत गति जीवन।

rashmi savita ने कहा…

Thanx mayank ji.

Shah Nawaz ने कहा…

वाह क्या खूब लिखा है रश्मि....