शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

"मगर मिटती नहीं"

तुम्हारे
मात्र होने से ही 
मन परितृप्त है, 
तबसे मगर, 
तुम तक राह कोई
है जो, 
फिर
दिखती रही

तुम्हारी 
अछूती, अदृश्य, अंजानी  
तरंगों में, 
महसूस करती हूँ
कि तुम हो 
और तुमसे, 
जागृत है मुझमें 
गुनगुनी धूप जाड़ों की 
शीतलता पहाड़ों की,

ये तुम में 
चाह  
ऐसी है कि 
उठ गयी है, मगर
गिरती नहीं ;

बोध का 
मात्र दीपक ही सही 
बनकर जले 
मुझे बाती बनाकर 
'मन' मेरा 
मुझमे पले, 
कि तुमसे 
मिलूं जब, 
मन 
खरा सोना बन सके, 
धैर्य के सांचों में 
अप्रतिम ढल सके, 

तुम, 
जानते तो होगे प्रिय! 
यह तुमसे ही मिली है 
प्यास, 
जो रह-रह कर
उमगती है 
मगर मिटती नहीं। 

रविवार, 1 जून 2014

"कुछ अटकाव, कुछ भटकाव"

कुछ अटकाव,
कुछ भटकाव 
पल -पल की 
किस्सागोई से 
दिन बनते हैं 
और अहर्निश 
हम जलते हैं 
अग्निशिखा में 
अपने मन की
किसी सपन की
राह जो पकड़ी 
कहीं अटकते 
कहीं भटकते 
फिर से शुरू 
शुरू करते से 
एक शून्य में 
लगा है चक्कर 
भरते गए 
बही खाते 
पर 
चक्र चलाकर 
धुरी जो खोई 
बिखरे सभी पत्र 
सांसों के,  
फिर 
हमने
धङकन को समझाया,
पहुचेंगे तो 
तू चलती रह, 
ये तो आते ही रहते हैं 

कुछ अटकाव,
कुछ भटकाव।  


शुक्रवार, 30 मई 2014

तुम आये भी तो...

तुम  थे 
मेरे स्वप्नों के 
सोपानों की मंज़िल 
मेरी 
अनंत आकांक्षाओं का 
समाधान 

मेरी संवेदनाओं की मंथर सरिता
तुम्हारे होने से होकर, 
हो जाती थी
एक उत्फुल 'पहाड़ी नदी'
और 
मेरा होना हो जाता था
कोई नाचता 'निर्झर';

हिमाचली 'हवाओं' सा ही 
था नेह 
बस तिरने को
तुम्हारे आसपास 
बनकर बादल 
तुम्हारे लिए सुमधुर छाया को; 

फिर भी, 
तुम्हारा यूँ मुड़ जाना 
मेरे दिन के सूरज को 
और तपा गया
रात  के अंधियारे को कर गया
और भी गहरा;

तुम मुड़े 
कि मेरा ठहर गया समय 
समय के उस अनचाहे मोड़ के सहारे 
जिंदगी ने बदली अपनी दिशा 
गंतव्य  और रास्ता भी,
राह थी पर 
मीठे सपनों से वीरान 
और इंद्रधनुषी 
आकांक्षाओं से खाली;

उन 
खिलखिलाती हवाओं की चंचलता 
थिरता  का समीर बन 
जीवन की स्वाँस  का 
अब संतुलन भर साधती है;

अब वही पहाड़ी नदी 
बहती है किन्ही 
अनजान घाटियों में 
चुपचाप इतना कि 
खबर नहीं किनारों को  भी; 

फिर.…………

तुम आये भी तो तब 
जब 
निर्झर इतना था शांत 
कि 
तुम्हारे क़दमों की आहट  से 
कंपा तक नहीं 
हाँ,
खिलखिलाया जरूर 
और फिर 
हंस पड़ा अपने पर 
कुछ और बूंदे गवांकर। 




शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

"कहाँ आया है मुझे"

 सुनकर रुकना 
कहाँ आया है मुझे;
 
तुम्हारे आवाह्न  पर
ठहर तो जाती हूँ सहसा
पर चलने लगती हूँ 
फिर फिर
उन्हीं राहों पर.… 
पर मुझे कहो,
कितना भी चलती हूँ 
ये रास्ते  मुझे यूँ 
अनजाने क्यों ? 

एक- एक लम्हे का 
अहसान मुझ पर है 
मैनें उस से बातें की  हैं 
समझा है उसे 
पर 
समझती हूँ जो 
वह नहीं करती 
और जो करती हूँ 
वह जाने  क्यों?

तुम पूछते रहे हो न मुझसे 
कि तुम्हारे बारे में कुछ कहूँ 
झिझकती हूँ 
कि आखिर 
मेरे बारे में ही 
कह सकना दुष्कर है मुझे,
जन्मी तो हूँ पर 
मेरे होने ने भी 
कहाँ पाया है मुझे, 

 सुनकर रुकना 
कहाँ आया है मुझे।