बुधवार, 20 नवंबर 2013

" बेवजहों में , बेअर्थों में "

कहीं शून्य में मेरी दुनिया , कहीं दूर मेरा संसार;

मन जब अपनी गति से भटका 
राहों के आसूचक खोये, 
गहन अकेले होकर आज 
प्राण गहराई से रोये, 

भीतर दरकी हैं दीवारें 
शेष स्वप्न भी हारे-हारे 
जीवन की  मधुरिम मञ्जूषा, में किसने रखे अंगार, 

कहीं शून्य में मेरी दुनिया , कहीं दूर मेरा संसार; 

पर,बोझिल नहीं, उदास भी नहीं 
ये पलकें बस जरा हैं ठहरीं, 
कुछ आंसू से कुछ अनुभव से
आँखें हैं कुछ गहरी गहरी, 

एक दीप बस अंतरतम में,
आज नहीं मैं किसी वहम में
यदि सत्य अर्थ का नहीं प्रकाश, व्यर्थ मुझे जीवन व्यापार,

कहीं शून्य में मेरी दुनिया , कहीं दूर मेरा संसार; 

बेवजहों में , बेअर्थों में 
एक अर्थ की अनंत प्यास है, 
नेति- नेति को लक्ष्य मिलेगा 
जीवन की एक यही आस है,

ठुकराई सुन्दर मरीचिका 
मृग कस्तूरी के भ्रम तोड़े 
अब तो हों, हे देव !  मुझे कुछ जीवन सत्यों के अधिकार, 

कहीं शून्य में मेरी दुनिया , कहीं दूर मेरा संसार।