सोमवार, 28 जनवरी 2013

चल, धार में इकबार खुलकर बहा जाये।

निरंतर ये बुने जाते
स्वप्न भी हैं श्रंखलायें
कैद इनमे स्वयं  को तू क्यूँ करे

चल,  धार में इकबार खुलकर बहा जाये।


जन्मते ही खो गए हम
स्वयम को अब कहाँ ढूढे, कहाँ पायें
पर अंधेरों को, पार  ही करना हमें है

चल,  बुझ गए इस अप्पदीपो को जलाएं।


भार  कन्धों पर बहुत अब हो चला है
व्यर्थ के इस बोझ को थोडा हटायें
जिंदगी की साँझ यूँ ही आ न जाये 

चल,   उड़ चले हम जिंदगी को मोरपंखों से सजाये।


स्वागतम
बाहें पसारे कर रहा आकाश जब,
अब जिंदगी का सूर्य थोडा मुस्कुराये



तू क्यूँ पड़ा है झूठ में चेहरा छिपाये
दूसरों की उँगलियों पर बहुत खुद को नचाया है

चल,  अब स्वयं के साथ एक उत्सव मनाएं।


गुनगुनाये, 
एक चिड़िया ही सही
अब जिंदगी का सूर्य थोडा मुस्कुराये
क्षणों के इस वृक्ष पर कुछ तो हरा हो

चल, अब स्वयम के साथ कुछ यारी निभाएं।