रविवार, 10 नवंबर 2013

"तेरी अनदेखी सूरत से यूं मुहब्बत हुई"

तू अगर प्यास को कोई सागर दे दे 
तटों पर जाने  की किसकी मनुहार,

तू अगर मंदिर में पिला दे साकी 
तो जाना ही किसे है बाज़ार,

हम तो खुमारी के लम्बे दिन चाहें 
होश के अंतरालों के बिन चाहें,

तेरे दर पर इस आशा से निगाहें हैं रखीं 
    शायद मिट सके आज,सदियों का इंतज़ार,

तुझसे लगन कि अगन यूं तेज़ है,
कि दुनिया के अंगारे, अब झुलसाते नहीं,

    तेरी अनदेखी सूरत से यूं मुहब्बत हुई 
    ये तमाम सूरतें हुईं दिल को अब बेज़ार।    
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