गुरुवार, 29 अगस्त 2013

"जिसकी कि मै एक मोती हूँ"

हंसती हूँ कभी रोती  हूँ 
अपने में खुश होती हूँ, 
मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ; 

जो दूर खड़ा है मुझसे 
उससे क्यों जोडूं नाता 
मेरा हमदम है मुझमें 
जो दूर न मुझसे जाता, 
ओ प्रिय! तू उस माला का धागा 
जिसकी कि  मै एक मोती हूँ, 

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ ;

जब कहीं, कभी कुछ भी
छन से छनक जाता है, 
क्षण भर की इस थिरकन से 
तब ये मन डर जाता है, 
जब तू रहता है मुझमें 
और मैं अपने में होती हूँ,

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ; 

कुछ और करूँ  न करूँ  मगर
कोशिश करती हूँ भरसक 
नित तेरा धाम बुहारूं 
परिमल से भर दूं हर कण,
जो है प्रिय, तेरा प्रेम निकेतन  
उस मन की चादर धोती हूँ,

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ; 

इतना सब दिया है तूने 
हर अवयव है अनुपाती 
अनुपम मेरा दीपक है 
दीपक में पूरी बाती, 
तो फिर क्यूँ इसका रखूँ हिसाब 
कि क्या पाती और क्या खोती हूँ, 

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ।  

9 टिप्‍पणियां:

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार 30/08/2013 को
हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः9 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra

Shakti Suryavanshi ने कहा…

"faith"

तो फिर क्यूँ इसका रखूँ हिसाब
कि क्या पाती और क्या खोती हूँ..

bahut pyara gudiya..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत ही प्यारा गीत लिखा है आपने, ऐसे ही जीवन का रस लेकर चलती रहिये।

rashmi savita ने कहा…

Thanx Darshan Ji..

rashmi savita ने कहा…

THANX PRAVEEN JI :)

rashmi savita ने कहा…

:))

राजीव कुमार झा ने कहा…

हर अवयव है अनुपाती
अनुपम मेरा दीपक है
दीपक में पूरी बाती,
तो फिर क्यूँ इसका रखूँ हिसाब
कि क्या पाती और क्या खोती हूँ,
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ .

Virendra Kumar Sharma ने कहा…


मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ;

कुछ और करूँ न करूँ मगर
कोशिश करती हूँ भरसक
नित तेरा धाम बुहारूं
परिमल से भर दूं हर कण,
जो है प्रिय, तेरा प्रेम निकेतन
उस मन की चादर धोती हूँ,
मीरा भाव लिए बेहद सरस रचना बेहद के समर्पण संतोष से संसिक्त प्रभु प्रेम में भीगी भीगी नख शिख।

abhi ने कहा…

बहुत ही प्यारी कविता है!!! :)