बुधवार, 21 अगस्त 2013

"साँझ के झुटपुटे की पंक्तियों में"

साँझ के 
झुटपुटे की पंक्तियों में, 
शब्द सवेरे के,

अब तक ताज़े हैं 

चलो, गुलदस्ता बना लेते हैं एक और,
जिंदगी के लिए; 


किसी 

झिडकन के साथ, 
बरसी है
बारिश ये अभी,
कुछ बूंदे हथेली पर, 
कुछ माथे पर हैं, 
अथक श्रम कर रही है जिंदगी ये 
जिंदगी के लिए; 


जो है 

लुटाने को उसे है  तत्पर,
ये मुट्ठी खुल रही है 
पालने  से पैरों  तक का 
सफ़र तय किया है,
अब कितनी अकलमंदी से 
गवां रहे हैं जिंदगी को, 
जिंदगी के लिए


थोड़ी इसे भी राहतें  बख्शें, 

थोड़ी सी धडकनें 
इसकी भी रह सकें साबुत,, 
सिफ़र  कर दें कभी तो चाहतों को 
शेष रख लें कभी तो थोडा समय 
बेनज़र  सी गुजर जाती हुई इस 
जिंदगी के  लिए;

एक चिड़िया 
सुबह जो चहकी थी, 
अभी भी शाख पर दिल की,
वक़्त की दालान में बैठी है 
एक हाथ का ही फासला ये 
चाहें तो फिर से एक बार 
थोड़ी सी गुनगुनाहट लें सहेज,
थोड़ी से चहचहाहट  
जिंदगी के लिए.
Published in "Nirjhar imes"

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7 टिप्‍पणियां:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

जिन्दगी के लिये न जाने क्या क्या आवश्यक है.

Amrita Tanmay ने कहा…

अति सुन्दर ..

Gaurav Chauhan ने कहा…

मानो बात हो मेरे मन की, या कह दी हो उलझन इस जीवन कि, दे दी हो अभिलाषा उठने की, भर दी हो उमंग उड़ने कि.... सुन्दर अति सुन्दर

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जीवन के छोटे छोटे सुखों में जीवन को ढूढ़ लें।

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार, 23/08/2013 को
जनभाषा हिंदी बने.- हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः4 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


rashmi savita ने कहा…

:)thnx

expression ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना...
अथक श्रम कर रही है जिंदगी ये
जिंदगी के लिए;
वाह!!!
प्रकाशन हेतु बधाई!!!

अनु