शनिवार, 10 अगस्त 2013

"कुछ रंग -बिरंगे पत्थर"

जानती हूँ,

वापस नहीं लौटता समय 
पर दिल, 
फिर भी चाहता है 
लौट जाना, 
उसी नदी के आँचल में 
जिसके निश्छल किनारों से 
कुछ आड़े- तिरछे 
कुछ रंग -बिरंगे पत्थर, 
भरे थे अपनी जेबों में 
और छुपाकर रखा था 
घर के किसी कोने में 
अनमोल खजाने की तरह; 

जानती हूँ, 

एक बार गर सपनों के लिए 
खूबसूरत सपने से 
बाहर निकल गयी तो 
दूभर है
वापस आ पाना, 
पर दिल, 
फिर भी चाहता है एक सपना बुने, 
जो बिलकुल उस सपने की 
तरह हो 
जो आता रहता था मुझे कभी,
आसमां  के नीले
विस्तार को देखकर; 


जानती हूँ,

रास्ते हमेशा नहीं रहते साथ
परछाईं की तरह, 
फिर भी, 
उस सुकून की एक मीठी से छाया 
पीछा करती है मेरा, 
और अनवरत कहती रहती है- 
काश! फिर से 
मिल जाते वे रास्ते जिनके 
एक किनारे 
से पेड़ों की छावं  जाती थी 
दूसरे किनारे तक,
कि धूप  का
हमें पता भी न था 
धूप में चलकर। 
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