गुरुवार, 29 अगस्त 2013

"जिसकी कि मै एक मोती हूँ"

हंसती हूँ कभी रोती  हूँ 
अपने में खुश होती हूँ, 
मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ; 

जो दूर खड़ा है मुझसे 
उससे क्यों जोडूं नाता 
मेरा हमदम है मुझमें 
जो दूर न मुझसे जाता, 
ओ प्रिय! तू उस माला का धागा 
जिसकी कि  मै एक मोती हूँ, 

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ ;

जब कहीं, कभी कुछ भी
छन से छनक जाता है, 
क्षण भर की इस थिरकन से 
तब ये मन डर जाता है, 
जब तू रहता है मुझमें 
और मैं अपने में होती हूँ,

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ; 

कुछ और करूँ  न करूँ  मगर
कोशिश करती हूँ भरसक 
नित तेरा धाम बुहारूं 
परिमल से भर दूं हर कण,
जो है प्रिय, तेरा प्रेम निकेतन  
उस मन की चादर धोती हूँ,

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ; 

इतना सब दिया है तूने 
हर अवयव है अनुपाती 
अनुपम मेरा दीपक है 
दीपक में पूरी बाती, 
तो फिर क्यूँ इसका रखूँ हिसाब 
कि क्या पाती और क्या खोती हूँ, 

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ।  

बुधवार, 21 अगस्त 2013

"साँझ के झुटपुटे की पंक्तियों में"

साँझ के 
झुटपुटे की पंक्तियों में, 
शब्द सवेरे के,

अब तक ताज़े हैं 

चलो, गुलदस्ता बना लेते हैं एक और,
जिंदगी के लिए; 


किसी 

झिडकन के साथ, 
बरसी है
बारिश ये अभी,
कुछ बूंदे हथेली पर, 
कुछ माथे पर हैं, 
अथक श्रम कर रही है जिंदगी ये 
जिंदगी के लिए; 


जो है 

लुटाने को उसे है  तत्पर,
ये मुट्ठी खुल रही है 
पालने  से पैरों  तक का 
सफ़र तय किया है,
अब कितनी अकलमंदी से 
गवां रहे हैं जिंदगी को, 
जिंदगी के लिए


थोड़ी इसे भी राहतें  बख्शें, 

थोड़ी सी धडकनें 
इसकी भी रह सकें साबुत,, 
सिफ़र  कर दें कभी तो चाहतों को 
शेष रख लें कभी तो थोडा समय 
बेनज़र  सी गुजर जाती हुई इस 
जिंदगी के  लिए;

एक चिड़िया 
सुबह जो चहकी थी, 
अभी भी शाख पर दिल की,
वक़्त की दालान में बैठी है 
एक हाथ का ही फासला ये 
चाहें तो फिर से एक बार 
थोड़ी सी गुनगुनाहट लें सहेज,
थोड़ी से चहचहाहट  
जिंदगी के लिए.
Published in "Nirjhar imes"

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शनिवार, 10 अगस्त 2013

"कुछ रंग -बिरंगे पत्थर"

जानती हूँ,

वापस नहीं लौटता समय 
पर दिल, 
फिर भी चाहता है 
लौट जाना, 
उसी नदी के आँचल में 
जिसके निश्छल किनारों से 
कुछ आड़े- तिरछे 
कुछ रंग -बिरंगे पत्थर, 
भरे थे अपनी जेबों में 
और छुपाकर रखा था 
घर के किसी कोने में 
अनमोल खजाने की तरह; 

जानती हूँ, 

एक बार गर सपनों के लिए 
खूबसूरत सपने से 
बाहर निकल गयी तो 
दूभर है
वापस आ पाना, 
पर दिल, 
फिर भी चाहता है एक सपना बुने, 
जो बिलकुल उस सपने की 
तरह हो 
जो आता रहता था मुझे कभी,
आसमां  के नीले
विस्तार को देखकर; 


जानती हूँ,

रास्ते हमेशा नहीं रहते साथ
परछाईं की तरह, 
फिर भी, 
उस सुकून की एक मीठी से छाया 
पीछा करती है मेरा, 
और अनवरत कहती रहती है- 
काश! फिर से 
मिल जाते वे रास्ते जिनके 
एक किनारे 
से पेड़ों की छावं  जाती थी 
दूसरे किनारे तक,
कि धूप  का
हमें पता भी न था 
धूप में चलकर।