मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

एक ही हल 'शून्य'

'यहाँ'
सब कुछ,
जो पाया जा सकता है
पलक झपकते ही खो जाता है,
इतनी जल्दी
कि तुम उसकी एक रेखा
भी ढूढ़ पाने
में रह जाते हो असमर्थ;

'जीवन' 
साठ  साल
या
सौ साल
एक बहुत छोटा सा है 'समय बिंदु'
नामालूम सा, 
जिसमे तुम 
जिंदगी भर 
बिठाते रहते हो 
'जिंदगी के गणित', 
जिनका सब तरह 
से 
एक ही हल 
'शून्य' आता है; 

हमारी जिंदगी 
ऐसी हो गई है ,
जैसे 
गहरे 
सागर में डूबे हुए हैं हम 
जीने की जद्दोजहद में 
और
जहाँ भी,
जैसे भी मिल रहा है 
हाथ पैर मार रहे हैं, 
बिना ये जाने कि  
परिणाम  क्या होना है इसका;

ठीक हैं ये खेल 
रेत  के घर
या 
ताश के महल बनाना, 
पर बनाते हुए 
इतना जानते 
रहना है 
कि घर 
रेत  के हैं,
महल ताश के हैं; 

ताकि अपने लिए एक 
सुद्रढ़  जमीन की तलाश 
करना 
और 
अपनी संभावनाओं के
बीज की हिफाज़त करना 
हम भूल न जाएँ कहीं,

जो कि  
करीब - करीब 
हम भूले ही बैठे हैं।
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