मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

एक ही हल 'शून्य'

'यहाँ'
सब कुछ,
जो पाया जा सकता है
पलक झपकते ही खो जाता है,
इतनी जल्दी
कि तुम उसकी एक रेखा
भी ढूढ़ पाने
में रह जाते हो असमर्थ;

'जीवन' 
साठ  साल
या
सौ साल
एक बहुत छोटा सा है 'समय बिंदु'
नामालूम सा, 
जिसमे तुम 
जिंदगी भर 
बिठाते रहते हो 
'जिंदगी के गणित', 
जिनका सब तरह 
से 
एक ही हल 
'शून्य' आता है; 

हमारी जिंदगी 
ऐसी हो गई है ,
जैसे 
गहरे 
सागर में डूबे हुए हैं हम 
जीने की जद्दोजहद में 
और
जहाँ भी,
जैसे भी मिल रहा है 
हाथ पैर मार रहे हैं, 
बिना ये जाने कि  
परिणाम  क्या होना है इसका;

ठीक हैं ये खेल 
रेत  के घर
या 
ताश के महल बनाना, 
पर बनाते हुए 
इतना जानते 
रहना है 
कि घर 
रेत  के हैं,
महल ताश के हैं; 

ताकि अपने लिए एक 
सुद्रढ़  जमीन की तलाश 
करना 
और 
अपनी संभावनाओं के
बीज की हिफाज़त करना 
हम भूल न जाएँ कहीं,

जो कि  
करीब - करीब 
हम भूले ही बैठे हैं।

11 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कुछ ठोस, आने वालों के लिये..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के बुधवारीय चर्चा ( 1224 ) ----- यह कैसी दरिंदगी घुली घुली फिजां में ..(मयंक का कोना)
पर भी होगी!
सादर....।
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

Shah Nawaz ने कहा…

Sundar Shabd aur gehre ahsas.... Bahut khoob!

shashi purwar ने कहा…

sundar sarthak post

अरुणा ने कहा…

एक ही हल 'शून्य'.........सार्थक रचना रश्मिजी ........

saurabh singh ने कहा…

अदभुत अदभुत ...........

saurabh singh ने कहा…

अदभुत अदभुत ...........

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

kaha ho rashmi tum ? contact me.

rashmi savita ने कहा…

didi, aapka contact no. miss ho gaya hai mujhse.

Vandana Tiwari ने कहा…

आदरेया आपकी यह प्रभावी प्रस्तुति 'निर्झर टाइम्स' संकलन में शामिल की गई है।
http://nirjhar-times.blogspot.com पर आपका स्वागत् है,कृपया अवलोकन करें।
सादर

Shakti Suryavanshi ने कहा…

my pick... "ठीक हैं ये खेल
रेत के घर
या
ताश के महल बनाना,
पर बनाते हुए
इतना जानते
रहना है
कि घर
रेत के हैं,
महल ताश के हैं;"

nalayal ladki..u r awsm as always