सोमवार, 28 जनवरी 2013

चल, धार में इकबार खुलकर बहा जाये।

निरंतर ये बुने जाते
स्वप्न भी हैं श्रंखलायें
कैद इनमे स्वयं  को तू क्यूँ करे

चल,  धार में इकबार खुलकर बहा जाये।


जन्मते ही खो गए हम
स्वयम को अब कहाँ ढूढे, कहाँ पायें
पर अंधेरों को, पार  ही करना हमें है

चल,  बुझ गए इस अप्पदीपो को जलाएं।


भार  कन्धों पर बहुत अब हो चला है
व्यर्थ के इस बोझ को थोडा हटायें
जिंदगी की साँझ यूँ ही आ न जाये 

चल,   उड़ चले हम जिंदगी को मोरपंखों से सजाये।


स्वागतम
बाहें पसारे कर रहा आकाश जब,
अब जिंदगी का सूर्य थोडा मुस्कुराये



तू क्यूँ पड़ा है झूठ में चेहरा छिपाये
दूसरों की उँगलियों पर बहुत खुद को नचाया है

चल,  अब स्वयं के साथ एक उत्सव मनाएं।


गुनगुनाये, 
एक चिड़िया ही सही
अब जिंदगी का सूर्य थोडा मुस्कुराये
क्षणों के इस वृक्ष पर कुछ तो हरा हो

चल, अब स्वयम के साथ कुछ यारी निभाएं।


10 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना!

Sunil Kumar ने कहा…

bahut sundar rachna ,badhai

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन में महके, खुली हवा के झोंके सारे..

शालिनी कौशिक ने कहा…

सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति विवाहित स्त्री होना :दासी होने का परिचायक नहीं आप भी जाने कई ब्लोगर्स भी फंस सकते हैं मानहानि में .......

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

खुद से हो चले हैं दूर हम...... अच्छी लगी रचना

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

प्रभावशाली ,
जारी रहें।

शुभकामना !!!

आर्यावर्त
आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

deepesh patidar ने कहा…

Mam bahut sahi...
Feeling inspired after reading this..:)

deepesh patidar ने कहा…

Mam bahut sahi...
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rashmi savita ने कहा…

:) kase ho deepesh?

rashmi savita ने कहा…

:) kase ho deepesh?