बुधवार, 11 दिसंबर 2013

Lov U OSHO. :)




"जीवन में जो खिल उठा है फूल की तरह
उसके लिए प्रकट आभार तो कर लूं ,

जिसके परिमल की पवन में उड़ती हूँ फिरती
उससे आज प्यार का इज़हार तो कर लूं ,

उसके दिए हुए 'रौशनी के दिए' में सकूं चल
और मोहब्बत का नज़राना भी क्या दूं मैं उसे,

हाँ, चलूंगी तो द्वार उसके पर जरा ठहर
कुछ होश के कणों का श्रृंगार तो  कर लूं ".

Happy b'day OSHO.
:)
Many many Happy returns of this day will blossom my consciousness, fulfill my heart & enriched my life.

Lov U OSHO.

"तुमको देखा तो  ये ख्याल आया
जिंदगी धूप तुम घना साया"
:)

बुधवार, 20 नवंबर 2013

" बेवजहों में , बेअर्थों में "

कहीं शून्य में मेरी दुनिया , कहीं दूर मेरा संसार;

मन जब अपनी गति से भटका 
राहों के आसूचक खोये, 
गहन अकेले होकर आज 
प्राण गहराई से रोये, 

भीतर दरकी हैं दीवारें 
शेष स्वप्न भी हारे-हारे 
जीवन की  मधुरिम मञ्जूषा, में किसने रखे अंगार, 

कहीं शून्य में मेरी दुनिया , कहीं दूर मेरा संसार; 

पर,बोझिल नहीं, उदास भी नहीं 
ये पलकें बस जरा हैं ठहरीं, 
कुछ आंसू से कुछ अनुभव से
आँखें हैं कुछ गहरी गहरी, 

एक दीप बस अंतरतम में,
आज नहीं मैं किसी वहम में
यदि सत्य अर्थ का नहीं प्रकाश, व्यर्थ मुझे जीवन व्यापार,

कहीं शून्य में मेरी दुनिया , कहीं दूर मेरा संसार; 

बेवजहों में , बेअर्थों में 
एक अर्थ की अनंत प्यास है, 
नेति- नेति को लक्ष्य मिलेगा 
जीवन की एक यही आस है,

ठुकराई सुन्दर मरीचिका 
मृग कस्तूरी के भ्रम तोड़े 
अब तो हों, हे देव !  मुझे कुछ जीवन सत्यों के अधिकार, 

कहीं शून्य में मेरी दुनिया , कहीं दूर मेरा संसार। 

रविवार, 10 नवंबर 2013

"तेरी अनदेखी सूरत से यूं मुहब्बत हुई"

तू अगर प्यास को कोई सागर दे दे 
तटों पर जाने  की किसकी मनुहार,

तू अगर मंदिर में पिला दे साकी 
तो जाना ही किसे है बाज़ार,

हम तो खुमारी के लम्बे दिन चाहें 
होश के अंतरालों के बिन चाहें,

तेरे दर पर इस आशा से निगाहें हैं रखीं 
    शायद मिट सके आज,सदियों का इंतज़ार,

तुझसे लगन कि अगन यूं तेज़ है,
कि दुनिया के अंगारे, अब झुलसाते नहीं,

    तेरी अनदेखी सूरत से यूं मुहब्बत हुई 
    ये तमाम सूरतें हुईं दिल को अब बेज़ार।    

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

"जिसकी कि मै एक मोती हूँ"

हंसती हूँ कभी रोती  हूँ 
अपने में खुश होती हूँ, 
मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ; 

जो दूर खड़ा है मुझसे 
उससे क्यों जोडूं नाता 
मेरा हमदम है मुझमें 
जो दूर न मुझसे जाता, 
ओ प्रिय! तू उस माला का धागा 
जिसकी कि  मै एक मोती हूँ, 

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ ;

जब कहीं, कभी कुछ भी
छन से छनक जाता है, 
क्षण भर की इस थिरकन से 
तब ये मन डर जाता है, 
जब तू रहता है मुझमें 
और मैं अपने में होती हूँ,

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ; 

कुछ और करूँ  न करूँ  मगर
कोशिश करती हूँ भरसक 
नित तेरा धाम बुहारूं 
परिमल से भर दूं हर कण,
जो है प्रिय, तेरा प्रेम निकेतन  
उस मन की चादर धोती हूँ,

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ; 

इतना सब दिया है तूने 
हर अवयव है अनुपाती 
अनुपम मेरा दीपक है 
दीपक में पूरी बाती, 
तो फिर क्यूँ इसका रखूँ हिसाब 
कि क्या पाती और क्या खोती हूँ, 

मैं तितली हूँ प्रभु तेरी, जीवन का रस ढोती हूँ।  

बुधवार, 21 अगस्त 2013

"साँझ के झुटपुटे की पंक्तियों में"

साँझ के 
झुटपुटे की पंक्तियों में, 
शब्द सवेरे के,

अब तक ताज़े हैं 

चलो, गुलदस्ता बना लेते हैं एक और,
जिंदगी के लिए; 


किसी 

झिडकन के साथ, 
बरसी है
बारिश ये अभी,
कुछ बूंदे हथेली पर, 
कुछ माथे पर हैं, 
अथक श्रम कर रही है जिंदगी ये 
जिंदगी के लिए; 


जो है 

लुटाने को उसे है  तत्पर,
ये मुट्ठी खुल रही है 
पालने  से पैरों  तक का 
सफ़र तय किया है,
अब कितनी अकलमंदी से 
गवां रहे हैं जिंदगी को, 
जिंदगी के लिए


थोड़ी इसे भी राहतें  बख्शें, 

थोड़ी सी धडकनें 
इसकी भी रह सकें साबुत,, 
सिफ़र  कर दें कभी तो चाहतों को 
शेष रख लें कभी तो थोडा समय 
बेनज़र  सी गुजर जाती हुई इस 
जिंदगी के  लिए;

एक चिड़िया 
सुबह जो चहकी थी, 
अभी भी शाख पर दिल की,
वक़्त की दालान में बैठी है 
एक हाथ का ही फासला ये 
चाहें तो फिर से एक बार 
थोड़ी सी गुनगुनाहट लें सहेज,
थोड़ी से चहचहाहट  
जिंदगी के लिए.
Published in "Nirjhar imes"

.   

शनिवार, 10 अगस्त 2013

"कुछ रंग -बिरंगे पत्थर"

जानती हूँ,

वापस नहीं लौटता समय 
पर दिल, 
फिर भी चाहता है 
लौट जाना, 
उसी नदी के आँचल में 
जिसके निश्छल किनारों से 
कुछ आड़े- तिरछे 
कुछ रंग -बिरंगे पत्थर, 
भरे थे अपनी जेबों में 
और छुपाकर रखा था 
घर के किसी कोने में 
अनमोल खजाने की तरह; 

जानती हूँ, 

एक बार गर सपनों के लिए 
खूबसूरत सपने से 
बाहर निकल गयी तो 
दूभर है
वापस आ पाना, 
पर दिल, 
फिर भी चाहता है एक सपना बुने, 
जो बिलकुल उस सपने की 
तरह हो 
जो आता रहता था मुझे कभी,
आसमां  के नीले
विस्तार को देखकर; 


जानती हूँ,

रास्ते हमेशा नहीं रहते साथ
परछाईं की तरह, 
फिर भी, 
उस सुकून की एक मीठी से छाया 
पीछा करती है मेरा, 
और अनवरत कहती रहती है- 
काश! फिर से 
मिल जाते वे रास्ते जिनके 
एक किनारे 
से पेड़ों की छावं  जाती थी 
दूसरे किनारे तक,
कि धूप  का
हमें पता भी न था 
धूप में चलकर। 

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

एक ही हल 'शून्य'

'यहाँ'
सब कुछ,
जो पाया जा सकता है
पलक झपकते ही खो जाता है,
इतनी जल्दी
कि तुम उसकी एक रेखा
भी ढूढ़ पाने
में रह जाते हो असमर्थ;

'जीवन' 
साठ  साल
या
सौ साल
एक बहुत छोटा सा है 'समय बिंदु'
नामालूम सा, 
जिसमे तुम 
जिंदगी भर 
बिठाते रहते हो 
'जिंदगी के गणित', 
जिनका सब तरह 
से 
एक ही हल 
'शून्य' आता है; 

हमारी जिंदगी 
ऐसी हो गई है ,
जैसे 
गहरे 
सागर में डूबे हुए हैं हम 
जीने की जद्दोजहद में 
और
जहाँ भी,
जैसे भी मिल रहा है 
हाथ पैर मार रहे हैं, 
बिना ये जाने कि  
परिणाम  क्या होना है इसका;

ठीक हैं ये खेल 
रेत  के घर
या 
ताश के महल बनाना, 
पर बनाते हुए 
इतना जानते 
रहना है 
कि घर 
रेत  के हैं,
महल ताश के हैं; 

ताकि अपने लिए एक 
सुद्रढ़  जमीन की तलाश 
करना 
और 
अपनी संभावनाओं के
बीज की हिफाज़त करना 
हम भूल न जाएँ कहीं,

जो कि  
करीब - करीब 
हम भूले ही बैठे हैं।

शनिवार, 9 मार्च 2013

"HaPpY BiRthDaY tO YoU" :)

चाहती  हूँ आज,
मेरे अंजुमन में,
जो भी हो 
मुझे सबसे प्रिय,
दे सकू तुम्हें;

तुम्हारी ख्वाहिशों को लग जाएँ
पंख मेरी शफ्कतों के,
तुम्हारे
सपनों के इन्द्रधनुष
जगमगाते रहें;

तुम्हारी राह के कांटे
ईश्वर फूल कर दे,
और जिंदगी की तपती दुपहरों में
तुम्हारे लिए
सदा जुटी रहें कुछ बदलियाँ
हैप्पी बर्थडे  to यू :)
तुम्हारी ऊँचाइयों के गीत
शिखर गुनगुनाते रहें,

तुमसे किसी अहद की आस नहीं
बस तुम्हारे गम
तुम्हारे न रहें,
मेरी व्यथाएं हो जाएँ

तुम्हारे  दिन सूरज हों,
रातें चाँद-सितारे ,
रब करे   
तुम्हारे सब लम्हें
ख़ुशी की कथाएं हो  जाएँ;

तुम्हारी हंसी की
आहटें  ही 
मेरे द्वार की दस्तक हों
तुम्हारी
मुस्कुराहटों की  रौशनी से
जिंदगी के दीप  झिलमिलाते रहें।

सोमवार, 28 जनवरी 2013

चल, धार में इकबार खुलकर बहा जाये।

निरंतर ये बुने जाते
स्वप्न भी हैं श्रंखलायें
कैद इनमे स्वयं  को तू क्यूँ करे

चल,  धार में इकबार खुलकर बहा जाये।


जन्मते ही खो गए हम
स्वयम को अब कहाँ ढूढे, कहाँ पायें
पर अंधेरों को, पार  ही करना हमें है

चल,  बुझ गए इस अप्पदीपो को जलाएं।


भार  कन्धों पर बहुत अब हो चला है
व्यर्थ के इस बोझ को थोडा हटायें
जिंदगी की साँझ यूँ ही आ न जाये 

चल,   उड़ चले हम जिंदगी को मोरपंखों से सजाये।


स्वागतम
बाहें पसारे कर रहा आकाश जब,
अब जिंदगी का सूर्य थोडा मुस्कुराये



तू क्यूँ पड़ा है झूठ में चेहरा छिपाये
दूसरों की उँगलियों पर बहुत खुद को नचाया है

चल,  अब स्वयं के साथ एक उत्सव मनाएं।


गुनगुनाये, 
एक चिड़िया ही सही
अब जिंदगी का सूर्य थोडा मुस्कुराये
क्षणों के इस वृक्ष पर कुछ तो हरा हो

चल, अब स्वयम के साथ कुछ यारी निभाएं।