रविवार, 21 अक्तूबर 2012

तुम्हारे जाने के बाद भी...

तुम्हारे जाने के बाद भी

निकले हैं सूरज,
खिली है धूप,
आया है वसंत,
मुस्कुराएँ हैं फूल,
और गुनगुनाते रहें हैं भौरें,
पर
तुम नहीं हो
तो चटख नहीं है धूप,
उदास है  वसंत,
थोडा रुआंसे हैं फूल,
और  भवरें गुनगुनाते हैं
कभी-कभी 
किन्हीं 
नामालुम उदासियों के गीत;

तुम चले गए  हो
तो भी
राहें वैसी ही चल रही हैं, 
पगडंडियों में वही धूल है, 
सवेरा भी होता है,
रात भी आती है,
संसार की वैसी ही है धुन
पर
तुम्हारे न होने से
दिशाएं खो गयी हैं  राहों की, 
धूल के बड़े हो गए हैं  गुबार,
उतना उत्साह नहीं सवेरों में,
रातों का चाँद भी
कहीं खोया-खोया सा है,
संसार की हर धुन है
गुमसुम,
और किन्हीं  अर्थों में 
ज़रा मायूस है जिंदगी।