रविवार, 15 जुलाई 2012

दो- चार लिखकर शब्द,
और फिर
ठिठकती अपनी कलम से 
कहा मैंने 
ऐ सहृदय !
तू तो न बन निष्ठुर 
कि पहले से ही 
निष्ठुर है समूचा जग, 
मत छीन  मुझसे 
आश्रय मेरा, तू प्यारी इस तरह

तू है 
तो कुछ कहना मेरा संभव 
तू है
तो कुछ  रहना मेरा संभव 

तू है तो ही अस्तित्व मेरा 
समझती हूँ मै  
तेरे लिए ही  भावना के 
द्वार पर हूँ 

जीवन मेरा यदि कल्पना का वृत्त 
तो तू परिधि उसकी 
जीवन मेरा यदि एक रूठा स्वप्न 
तो तू सुरति  उसकी 

सहस्त्रों अश्रुओं की
बूँद को अक्षर बनाकर 
पंक्तियाँ दर पंक्तियाँ 
तूने  सजायीं 
और मुस्कुराहटों का 
जरा सा रंग लेकर 
कुछ खुशनुमा  लम्हों की 
सुन्दर अल्पना तूने  बनायी

प्रिय!
असीमित सुखों के वरदान 
अस्वीकार मुझको 
मगर न तुझे खोना, 
तू है तो हूँ आश्वश्त मै
कि  मौन होना है मेरा संभव
मगर न मूक होना।  
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