रविवार, 18 मार्च 2012

ये बात और है

मै नहीं चाहती 
कि 
कभी चाहो तुम मुझे, 
ये बात और है 
कि प्रेम है तुम्हें मुझसे 
और
ये बात और है 
कि
चाहते हो तुम मुझे
क्योंकि प्रेम तो शाश्वत है 
आकाश की तरह 
पर चाहतें तो व्यर्थ हो जाती हैं 
पूरी होते ही.




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तुम चाहो 
तो मै घटा बन जाऊ 
और बरसूँ इतना कि  
भीग सको तुम 
जीवन से,
प्रेम से...
और मै चाहूं तो
व्र्क्ष बन जाओ तुम,
सुकून के पल हों 
मेरे हिस्से 
जिसकी छांव के तले, 
पर थोड़ा संभालना 
ताकि मै 
तुम्हारे 
होने की वजह न बन जाऊ
और तुम 
मेरे जीने की वजह न बन जाओ.
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