शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

तुमने कहा- रोना मत

समय के कुछ टुकड़ों से 
बेपनाह मुहब्बत है मुझे, 

ये वही टुकड़े हैं 
जो कभी 
तुमने मेरे लिए जिए 
या मैंने  तुम्हारे लिए
अब चाहती तो हूँ कि
तू मेरे पास रहे ,
पर कैसे मै,
जाने भी न दूं तुझे;

ह्रदय एक झील था अब  तक  
अब नदी है अल्हड़
किसी सागर के लिए
अधैर्य है थोडा
फिर भी न चाहूंगी कि
तू कभी
मेरे लिए भी झुके,

तेरी उनींदी आखों में
देखूं खुद को
तो सब होश खो जाते हैं
और तू अगर छू  ले
तो मेरे लम्हें
सब रह जाते हैं रुके;


तुम यहाँ
मुझमे रह जाओगे
और मै वहां तुझमे
इसलिए
तुम जाओ इसके पहले
क्षणों में जला दो 
ऐसा दीपक
जो कभी न बुझे,

तुमने कहा- रोना मत
तो पलकों के मोती
आखों की सीप में
बंद ही रखूंगी
पर कहो कैसे
मै  यूँ ही
विदा  दूं तुझे,

समय के कुछ टुकड़ों से
बेपनाह मुहब्बत है मुझे
















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