रविवार, 4 दिसंबर 2011

...पर कभी- कभी

तुम्हें
बहुत- बहुत
याद करने
और खो जाने के बीच
पलकें कब नम
हो जाती हैं
पता ही नहीं चलता;

अब तुम मुझमे हो और मै
परिपूर्ण इतना 
कि किसी और आश्रय की 
चाह नहीं
काश कि
तुम्हें पता चलता मेरी आहटों का
तुम्हारे बिन,
मेरी फीकी हुई मुस्कुराहटों का;

तुम खुद को
बहला रहे हो
तो
मै भी अब,
पर कभी- कभी
लम्हें हो जाते हैं जिद्दी
और दिल मानता ही नहीं
कि
कुछ फूल हैं
जो कभी नहीं खिलते
कुछ लम्हें छूट जाते हैं
तो कभी नहीं मिलते;

ठहर गए हैं कदम
तुम तक आकर
और अब 
कहीं  जाने की चाह नहीं करते
इन्हें कैसे समझाउं कि
किसी-किसी शाम की
सहर नहीं होती
और किसी-किसी रात का
दिन नहीं निकलता.