मंगलवार, 24 मई 2011

अब इतना भी मत याद आओ मुझे.

तुमने कहा था-
तुम सवेरा नहीं हो,साँझ भी नहीं ,
तुम पूरा दिन हो,
और पूरे दिन का हर एक लम्हा भी,

पर अब जब पूरा कैनवास
लेकर बैठती हूँ दिन का
तुम्हारा जरा अक्स भी कहीं नहीं,
अब इन शफ्कतों का क्या करूँ
तुम्हारा होना, तुम्हारी खुशबू
जो  रह जाएगी पास मेरे यहीं कहीं, 

तुम मेरी धूप के साथ
मेरी सारी छाँव लेकर मत जाना  
जाते-जाते स्मृतियों का 
विह्वल  गाँव देकर मत जाना   ,

मै फूल लिखती हूँ 
क्यूँ अब पंखुरी हो जाते हैं
कुछ मौसम जाते नहीं
यादों की धुरी  हो जाते हैं,
बरस जायेंगे बादल तो  
धरती को इतना अफ़सोस नहीं होगा
कोई याद करेगा पीछे
और किसी को कुछ होश नहीं होगा.

मुझे आवाज़ न दो कभी
कोई शिकवा नहीं
बस पुकारूँ गर कभी तो सुन लेना
ठहर जाना वहीँ

ह्म्म्म......
रहने दो, मत गुनगुनाओ मुझे,
बस करो,
अब इतना भी मत याद आओ मुझे.