गुरुवार, 17 मार्च 2011

थोड़ी ज्यादा ख्वाहिशें

थोड़ी ज्यादा ख्वाहिशें,
थोडा बड़ा आसमान 
नन्हे-नन्हे परों से ,
लम्बी एक उड़ान;
कि हम तो सपनों पर चलते हैं,
उम्मीदों से थोड़ा ज्यादा मचलते हैं .

मुठी में सूरज है, 
हमसे ही है सहर, 
ये हमारी फितरत है 
चाह लें जो हम अगर, 
बरसने को धरती पर 
अम्बर में बिखरे सितारे पिघलते हैं. 

थोडा सा इखलास , थोड़ी सकावत 
थोड़ी सी मस्ती भी 
ppt, xams ,cg और events हैं
तो मौजों की कश्ती भी,
nights never exists और दिन ये हमारे इशारों पर ढलते हैं; 
कि  हम तो सपनों पर चलते हैं... 
उम्मीदों से थोड़ा ज्यादा मचलते हैं ...
                                                                                      - रश्मि सविता