शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

सपने अभी...

सपने अभी ख़त्म नहीं हुए हैं,
तुम्हे देखती हूँ 
तो यही ख्याल आ जाता है बरबस
और लगता है कि
तितलियों के लिए भी है कोई जगह, 
फूलों के लिए भी है कोई बागान,
इन्द्रधनुष निकलने पर नाचना,
कहीं तो संभव है अभी भी
और जब बारिश हो , 
भीगने का मन करे तो
कोई साथ है सुनने को 
बूंदों की टप-टप ख़ामोशी 
पर ...
तुम्हे देखती हूँ
तो डर से सिहर भी जाती हूँ 
क्योंकि सुबह होती है तो 
शाम भी,
बादल बरसते हैं...तो 
चले भी जाते हैं, 
और सपने...
तो सपने ही होते हैं
अचानक  नींद खुल जाती है तो 
टूट जाते हैं ऐसे
कि फिर ..
सिर्फ किरचे ही किरचे  
बिखरे रह जाते हैं
सिरहाने .

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