बुधवार, 23 नवंबर 2011

पाती एक अनाम

कई दिनों तक
रही हाशिये पर
कविता के नाम
आज लिख रही हूँ मै
अपनी
पाती एक अनाम ,

पाती एक अनाम
कि जिसमे लिखी थकावट
और लिख दिया
थोडा-थोडा
मिला हुआ आराम,

मिला हुआ आराम
साथ में धन्यवाद भी
और लिख दिया
स्नेहिलमय
मीठा एक प्रणाम,

मीठा एक प्रणाम
ताकि वह मुस्काए तो
और मुस्कुराकर
हौले से पास आये तो
निर्झरिणी वह
कविता की जो
बहती है अविराम,

बहती है अविराम
लिए मेरे प्राणों को
मेरे उर के सुर में
छिड़े हुए तारों को
कौन जानता है निर्झरिणी
कहाँ है तेरा गाम,

कहाँ है तेरा गाम
सदानीरा तू कैसे
कैसे  रहता है
म्रदु हरदम तेरा कोसा
क्या मेघों ने
तेरी म्रदुमयता को पोसा
आहा कैसे  मधुर कंठ ने
परुष धरा ली थाम,

परुष धरा ली थाम
और पलकों को छूकर
बन शबनम  
पत्ते-पत्ते पर बरसी है
फूल खिलाकर
इन्द्रधनुष बन
नन्हे शिशु सी हरषी है
याद तुझे कर
सत्यम शिवम्
सुन्दरम हो गयी शाम

कई दिनों तक
रही हाशिये पर

कविता के नाम.




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