शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

सपने अभी...

सपने अभी ख़त्म नहीं हुए हैं,
तुम्हे देखती हूँ 
तो यही ख्याल आ जाता है बरबस
और लगता है कि
तितलियों के लिए भी है कोई जगह, 
फूलों के लिए भी है कोई बागान,
इन्द्रधनुष निकलने पर नाचना,
कहीं तो संभव है अभी भी
और जब बारिश हो , 
भीगने का मन करे तो
कोई साथ है सुनने को 
बूंदों की टप-टप ख़ामोशी 
पर ...
तुम्हे देखती हूँ
तो डर से सिहर भी जाती हूँ 
क्योंकि सुबह होती है तो 
शाम भी,
बादल बरसते हैं...तो 
चले भी जाते हैं, 
और सपने...
तो सपने ही होते हैं
अचानक  नींद खुल जाती है तो 
टूट जाते हैं ऐसे
कि फिर ..
सिर्फ किरचे ही किरचे  
बिखरे रह जाते हैं
सिरहाने .

बुधवार, 23 नवंबर 2011

पाती एक अनाम

कई दिनों तक
रही हाशिये पर
कविता के नाम
आज लिख रही हूँ मै
अपनी
पाती एक अनाम ,

पाती एक अनाम
कि जिसमे लिखी थकावट
और लिख दिया
थोडा-थोडा
मिला हुआ आराम,

मिला हुआ आराम
साथ में धन्यवाद भी
और लिख दिया
स्नेहिलमय
मीठा एक प्रणाम,

मीठा एक प्रणाम
ताकि वह मुस्काए तो
और मुस्कुराकर
हौले से पास आये तो
निर्झरिणी वह
कविता की जो
बहती है अविराम,

बहती है अविराम
लिए मेरे प्राणों को
मेरे उर के सुर में
छिड़े हुए तारों को
कौन जानता है निर्झरिणी
कहाँ है तेरा गाम,

कहाँ है तेरा गाम
सदानीरा तू कैसे
कैसे  रहता है
म्रदु हरदम तेरा कोसा
क्या मेघों ने
तेरी म्रदुमयता को पोसा
आहा कैसे  मधुर कंठ ने
परुष धरा ली थाम,

परुष धरा ली थाम
और पलकों को छूकर
बन शबनम  
पत्ते-पत्ते पर बरसी है
फूल खिलाकर
इन्द्रधनुष बन
नन्हे शिशु सी हरषी है
याद तुझे कर
सत्यम शिवम्
सुन्दरम हो गयी शाम

कई दिनों तक
रही हाशिये पर

कविता के नाम.