मंगलवार, 24 मई 2011

अब इतना भी मत याद आओ मुझे.

तुमने कहा था-
तुम सवेरा नहीं हो,साँझ भी नहीं ,
तुम पूरा दिन हो,
और पूरे दिन का हर एक लम्हा भी,

पर अब जब पूरा कैनवास
लेकर बैठती हूँ दिन का
तुम्हारा जरा अक्स भी कहीं नहीं,
अब इन शफ्कतों का क्या करूँ
तुम्हारा होना, तुम्हारी खुशबू
जो  रह जाएगी पास मेरे यहीं कहीं, 

तुम मेरी धूप के साथ
मेरी सारी छाँव लेकर मत जाना  
जाते-जाते स्मृतियों का 
विह्वल  गाँव देकर मत जाना   ,

मै फूल लिखती हूँ 
क्यूँ अब पंखुरी हो जाते हैं
कुछ मौसम जाते नहीं
यादों की धुरी  हो जाते हैं,
बरस जायेंगे बादल तो  
धरती को इतना अफ़सोस नहीं होगा
कोई याद करेगा पीछे
और किसी को कुछ होश नहीं होगा.

मुझे आवाज़ न दो कभी
कोई शिकवा नहीं
बस पुकारूँ गर कभी तो सुन लेना
ठहर जाना वहीँ

ह्म्म्म......
रहने दो, मत गुनगुनाओ मुझे,
बस करो,
अब इतना भी मत याद आओ मुझे.






10 टिप्‍पणियां:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

मुझे आवाज़ न दो कभी
कोई शिकवा नहीं
बस पुकारूँ गर कभी तो सुन लेना
ठहर जाना वहीँ

बेहद बढ़िया लिखा है आपने.

सादर

Shakti Suryavanshi ने कहा…

aisa laga jaise kai bhaavo ko ek sath bun diya ho..bina gaatho ke..तुम मेरी धूप के साथ
मेरी सारी छाँव लेकर मत जाना
जाते-जाते स्मृतियों का
विह्वल गाँव देकर मत जाना..plz

शिखा कौशिक ने कहा…

ह्म्म्म......
रहने दो, मत गुनगुनाओ मुझे,
बस करो,
अब इतना भी मत याद आओ मुझे
bahut bahut sundar ahsason ko sajaya hai aapne is kavita me .badhai .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच कहा, किसी में साँझ या सबेरा न ढूढ़ा जाये, पूरा का पूरा दिन निभाना है हमें।

बेनामी ने कहा…

I am fragment/ splinter I am after reading this/ I feel heartache wailing sorrow/ I can feel hopeless weeping sadness/ I can feel passion rage and madness...
Make room for me/ to lead and follow you/ beyond this rage of poetry.

Pramod Kumar Kush 'tanha' ने कहा…

तुम मेरी धूप के साथ
मेरी सारी छाँव लेकर मत जाना
जाते-जाते स्मृतियों का
विह्वल गाँव देकर मत जाना ,

behad khobsoorat rachna...baar baar padhne ko mann karta hai...badhaayee...

Sourabh Choudhary 'Suman' ने कहा…

bahut umda..

Regards
Suman
http://tum-suman.blogspot.com

alok ने कहा…

sunder panktiyan likhi hai...
bada hi jivant sa ahsas hai enme....

Ganesh Prasad ने कहा…

दोहरी मानसिकता...

रमणिका पे ऐसा कॉमेंट ..

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पर अब जब पूरा कैनवास
लेकर बैठती हूँ दिन का
तुम्हारा जरा अक्स भी कहीं नहीं,
अब इन शफ्कतों का क्या करूँ
तुम्हारा होना, तुम्हारी खुशबू
जो रह जाएगी पास मेरे यहीं कहीं.
******************************

:) ha.ha.ha......

बेनामी ने कहा…

bahut acchi kavita