रविवार, 27 फ़रवरी 2011

कितना चाहा...

कितना चाहा
लिखूं -
स्त्री के सुख, 
आमोद - प्रमोद ,
आखों में गहरी 
आशान्वित संवेदना 
उल्लास के हाथों में 
हाथ डाल खेलना ;
हर मुस्कान के पीछे 
एक गहरी हंसी 
एक के बाद एक 
मिली हुई ख़ुशी ;
ख्वाबों के पूरा 
होने का संतोष 
स्वजनों से सहा गया
 एक झूठा रोष ;
चाहा की लिखूं
उसके काम की सराहना 
उसके भी निर्णय का
कभी-कभी मानना;
थकने पर उसे मिला
चाय का एक कप 
कभी तो उस से पूछना
-और कहो अब;
पर...
नहीं लिख पाई 
लिखती कैसे 
लेखनी ने कह दिया-
नहीं लिखूंगी झूठ 
ऐसे-वैसे. 
एक टिप्पणी भेजें