रविवार, 5 सितंबर 2010

संसार की  संभावना की  रीत हूँ मै 
मीत ! तुमसे ही तुम्हारी जीत  हूँ मै;


बढ़ चली मै अलक्ष पथ पर 
ले हथेली पर नीहारे ,
नीव के मोती बने जो 
उन्ही स्वप्नों का मधुर संगीत हूँ मै; ....मीत! तुमसे ही ........


सभ्यता की सकल डगमग 
संस्कृति की सब कतारे
टिकी जिस पर है अहर्निश 
कल्प्कल्पो से कड़ी वह भीत हूँ मै ;....मीत! तुमसे ही ..........


टके जिस इतिवृत्त पर 
धैर्य , करुणा के सितारे 
जो अनंत , अनित्य , अद्भुत 
उस कथा के आदि का अभिनीत हूँ मै ;......मीत!  तुमसे ही ........


ह्रदय के तपते अधर पर 
पड़ी जो शीतल फुहारे 
कामना जिसकी सतत की
तेरी ही वरदायिनी वह प्रीत हूँ मै ;........मीत ! तुमसे ही ................


उपेक्षित , उद्विग्न हो मै 
शरद की लेकर बयारे 
फिर करती हू अवनि में 
ओह! कम्पित गात में ठिठुरती हुई शीत हूँ मै;....मीत! तुमसे ही ......


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