गुरुवार, 2 सितंबर 2010


अपने समय को 
बदल देना चाहती हू 
मिली सेकंड्स में ,
और जीना चाहती हू 
हर एक मिली सेकंड .....
क्योकि  क्या भरोसा है 
समय का ;
कि  कौन , कब 
दूर चला जाये
और फिर बहुत याद आये;
अफ़सोस नहीं करना चाहती हू 
कभी कि काश 
दो पल और मिल जाते 
और ....
उन अपनों के साथ 
उस घडी में 
थोडा और रह पाते; 
ये क्षण

बस  रेत है-
फिसल जाते है
जिन्दगी की मुट्ठी से
सिर्फ 
यादो के कुछ कण
चिपके रह जाते है
एक
जिद्दी बच्चे की
ख्वाहिशो की तरह
मन की हथेली पर ;
कई मौसमो के बाद
फिर याद आते है
वे खिलखिलाहटो के
बसंत
झगड़ो का शिशिर
और तू-तू , मै -मै की
सारी बरसाते ,
और फिर
बस यही लगता है -
"जिंदगी के सफ़र मे
 गुजर जाते है जो मुकाम
वो फिर नहीं आते ,
....फिर नहीं आते "