शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

तुम मुझे
कभी समझ नहीं आये ,
मैंने  समझ की 
मिटटी से ,
तुम्हारे लिए 
कई साचे
बनाये ,
पर
आगे बढ़ जाते हो 
तुम 
मेरे हर  साचे को 
बिना ठुकराए 
फूल पर पत्तियों की तरह ढके रहे तुम 
फूल दिन भर गुनता है तुम्हारी गुनगुन 
फिर  क्यों 
मेरे हर रोने पर
 तुम  मुस्कुराये ,
तुम मुझे कभी समझ नहीं आये .
इतना भीग जाने से
हमेशा बचना
की सुखा न सको,
 अपने वसन ,
क्योंकि मौसम हमेशा
एक जैसा नहीं
रहता
और
 साबुत नहीं रहते
हमेशा दर्पण .