बुधवार, 24 मार्च 2010

इतना भी शबनम

ये लम्हे

नहीं होते

शब् में जो बरसे

और सुबह खो जाए;

इतना न नम रखो

यादो के बादल को

हर अनकही को जो

आंसू बन धो जाए ;

जिन्दगी की चाही -

अनचाही राहो पर

पाया भी , खोया भी

मुस्काई , रोया भी ;

इतनी तो क्षणभंगुर

नहीं होती मुस्काने

दूर कोई जाए

और ये

चुपके से रो जाए ।