सोमवार, 15 मार्च 2010

किसी का कुछ भी

अपना नहीं होता

अगर होता तो

यू ही क्यों खोता ;

ये क्षण

कितने रेत है

फिसल जाते है

जिन्दगी की मुट्ठी से

और

यादो के कुछ कण

चिपके रह जाते है

एक

जिद्दी बच्चे की

ख्वाहिशो की तरह

मन की हथेली पर ;

कई मौसमो के बाद

फिर किसी को

याद नहीं रहता

भावना के कुछ बदल

कब , कहा बरसे

हर पतझड़ के बाद

आ ही जाता है

बसंत ,

और लोग कहते है -

जी लेंगे फिर -फिर से ।