शुक्रवार, 5 मार्च 2010


एक कशमकश के बाद का हालेसुकू जैसे ,
चाहकर जो चल भी दू , और न रुकू जैसे ;

समय की पगडंडियो पर ,
शबनमो को बांधकर,
लबों पर यूं खिलखिलाहट
के तराने साधकर ,
कौन हो तुम आ गए हो सुरमई शय से ;
देखती हूँ आसमा को
सोचती हूँ भानकर ,
जानती हूँ तुम्हे कैसे
न मै कुछ भी जानकर ,
कल्पना है या है सच , मै कह सकू कैसे ;
फासले भी हो अगर
तो दिलनशी हो ,
वक़्त कुछ ऐसे
हमारा हर हंसी हो ,
मुस्कराहट के मुकुल हो खिल गए जैसे;

कैनवासो पर उकेरी
जिन्दगी की हरअदा
आज शायद जुड़ी उसमे
दोस्ती की एक सदा ,
ये गीत लिखना है मुझे विस्वास की लय से ;

maa मेरे जीवन का,
तुम ही हो सबसे मधुरिम संगीत ;

तुम न कहोगी ,
तो भी हार जाउंगी ,
हर उस जगहपर
जंहा होगी तेरी जीत ; माँ ..........

तुम्हारा इतना भर पूछना
कि खाना खा लिया है तुमने
भर देता है मुझे भावना की बूंदों से
कोरो में स्नेह लगता है जमने

जीवन का हर वो क्षण प्यारा है मुझे
जिसमे है तेरी ममता अभिनीत; माँ ..........

माँ तुम्हारा देना इतना पूरा है कि
ना ही कुछ बाकी और ना ही अधूरा है
चाहती हूँ इतना स्नेह लुटाना की ,
भर सकू तेरे प्रेम से अपना खजाना

तुम मेरा आगत तुम ही इतिवृत्तभी
तुमसे ही पूरा है मेरा हर गीत ; माँ .........

कितना भी विस्तृत हो ,
पीढियो का अन्तराल
रुचिकर न लगे भले
परम्परावो का जाल ,

पर एक संकेत भी तेरा जो होगा माँ
पोषित करुँगी मै तेरी हर रीत ; माँ .........