बुधवार, 3 मार्च 2010

दो बूंदे

दो बूंदे ;
क्या क्या कह जांए ?
सींचा जिन्हें प्रेमघट लेकर
जिन बेलों को सौरभ देकर
वही लिपटकर तन पर यदि
गरल भरा विषधर बन जाये, दो बूंदे ......

जीवन को अम्बर सा देखा
खवाबो सी तारो की रेखा ,
वो ही सितारे खुद से प्यारे ,
यदि अब अनचाहे बन जाये , दो बूंदे....
स्वप्नों की झंझरी के नीचे
पीछे पीछे आँखे मीचे
जिनकी खातिर चलती आई ,
यदि यूं बेगाने बन जाये , दो बूंदे....