सोमवार, 6 दिसंबर 2010

"I dont care!"

तुमने मुझे 
कुएं से निकलने में मदद की ,
गुनगुनी धूप में रखा मुझे 
पंख सूख गये मेरे 
अब थोड़ा -थोड़ा
उड़ने लगी हूँ मै;


उस कोने से
कम दिखता था आसमान, 
तुमने मुझे पुचकारा 
मै दो कदम आगे आई 
मेरी खिड़की थोड़ी बड़ी हो गयी 
अब उस पर
फुदकने लगी हूँ मै;


मै बहुत फूल थी 
और डरती थी कांटो से 
तुमने कहा -
काँटों से मत डरो
पल्लवों को सख्त करो
तुम्हारी भी है सुबह-शाम 
अब सबोरोज़ बिखरने- 
सिमटने लगी हूँ मै ;


मै सीखती जा रही हूँ 
किसी भी मुंडेर पर बैठ जाना 
बालकनी के बाहर भी 
दुनिया का होना 
जान रही हूँ मै ,
तुम्हारा आग्रह था या हठ
नहीं जानती, पर अब 
सूरज की तरह 
खुद के पर्वतों से 
निकलने लगी हूँ मै;


दोस्त! वो तुम्हारी ही 
धूप थी 
कि अब 
डर नहीं लगता है 
कि फिर क्या होगा 
और बेवजह भी 
बर्फ की मानिंद 
पिघलने लगी हूँ मै;
और .....................
फिर भी तुम कहते रहते हो-
"I dont care !"
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