सोमवार, 6 दिसंबर 2010

"I dont care!"

तुमने मुझे 
कुएं से निकलने में मदद की ,
गुनगुनी धूप में रखा मुझे 
पंख सूख गये मेरे 
अब थोड़ा -थोड़ा
उड़ने लगी हूँ मै;


उस कोने से
कम दिखता था आसमान, 
तुमने मुझे पुचकारा 
मै दो कदम आगे आई 
मेरी खिड़की थोड़ी बड़ी हो गयी 
अब उस पर
फुदकने लगी हूँ मै;


मै बहुत फूल थी 
और डरती थी कांटो से 
तुमने कहा -
काँटों से मत डरो
पल्लवों को सख्त करो
तुम्हारी भी है सुबह-शाम 
अब सबोरोज़ बिखरने- 
सिमटने लगी हूँ मै ;


मै सीखती जा रही हूँ 
किसी भी मुंडेर पर बैठ जाना 
बालकनी के बाहर भी 
दुनिया का होना 
जान रही हूँ मै ,
तुम्हारा आग्रह था या हठ
नहीं जानती, पर अब 
सूरज की तरह 
खुद के पर्वतों से 
निकलने लगी हूँ मै;


दोस्त! वो तुम्हारी ही 
धूप थी 
कि अब 
डर नहीं लगता है 
कि फिर क्या होगा 
और बेवजह भी 
बर्फ की मानिंद 
पिघलने लगी हूँ मै;
और .....................
फिर भी तुम कहते रहते हो-
"I dont care !"

14 टिप्‍पणियां:

anurag shukla ने कहा…

I am not finding right words to express my feelings. Flow in this beautiful poem is no less than flowing of a rivlet. Truly a pictorial poem. Beauty of this beautiful work gets enhanced by rhythmic sophistication. Such display of poetic talent naturally creates a sense of wonder and appeals to the mind of the connoisseur.This poem carried me through...

Shakti Suryavanshi ने कहा…

sach me ab thoda thoda udne lagi ho tum..
sayad kuch badal raha hai ander..jo panno par saj raha hai..


nyways great..
:)

Yogi ने कहा…

वाह क्या बात है...बहुत सुन्दर रचना ! अच्छी प्रस्तुति...अपने मनोभावो को बहुत सुन्दर शब्द दिये हैं...काबिलेतारीफ बेहतरीन !! शुभकामनायें !!!

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

वाऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽह बच्चे....! तुम में बहुत सी आशाएं पाती हूँ मैं.....!

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

क्या प्रवाह है कविता में....आप तो अच्छा लिखती हैं जी....आपको ढूंढते हुए ऐसे ही आ गए और एक कवि दोस्त से भेंट हो गई...शुक्रिया...

Rashmi savita @ IITR ने कहा…

@ kanchan Di ...Apka ..much thanx....aapmera inspiration hain--pata hai aapko!

Rashmi savita @ IITR ने कहा…

@ nikhil Ji ...thanx

manish shukla ने कहा…

bahut achhi rachna hai ye rashmi...........n keep it up

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति। पहली बार आपको पढ़ना अच्छा लगा।

संजय भास्कर ने कहा…

वाह क्या बात है...बहुत सुन्दर रचना ! अच्छी प्रस्तुति...

Aseem ने कहा…

बिलकुल नए अंदाज़ में लिखी गयी बहुत अच्छी कविता....!

राजीव थेपड़ा ने कहा…

अरे ये कहाँ लाकर अंत कर दिया आपने.....मुझे लगा था....कि अब ये वाक्य निकलेंगे....."अब जब बाहर उड़ने को आतुर हूँ....और मेरे पंख सारा आकाश नाप लेने को बेताब....तुम कहते हो आई डोंट केयर...घर में बैठो....(पिंजरे में रहो....!!).....बाकी शुरू से अंत तक बांधे रखा कविता ने मुझे.....सच....!!

abhi ने कहा…

वाह...पहली बार आया आपके ब्लॉग पे और इतनी प्यारी कविता :)
बहुत खूबसूरत!!

राकेश कौशिक ने कहा…

एक ऐसी रचना जिसकी जितनी तारीफ की जाय उतनी कम है - अति सुंदर - लाजवाब