गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

चल, जिंदगी में लौट चल ....

जहाँ से 
जिंदगी को छोड़ा था 
चलकर वहीँ पर 
हाथ उसका पकड़ ले , क्या पता कब आये कल;
चल , जिंदगी में लौट चल...


जामुनी वे 
स्वप्न , मीठी हर शरारत 
छोड़ आये हैं जहाँ पर 
शोख नटखटपन और ख़ुशी के म्रदु पल ;
चल, जिंदगी में लौट चल ....


ये जिंदगी एक 
डोर , जिसमे पतंग 
अपनी ख्वाहिशें ,
बस कसकती है हवा कि बेरुखी कि गल;
चल , जिंदगी में लौट चल...


भले ही
शोर  लगता हो किसी को 
तटों पर मौजों का गिरना 
मगर एक निर्वाक से, ये प्रिय मुझे हलचल;
चल, जिंदगी में लौट चल.....
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