गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

और मै कहना नहीं चाहती!

मै नहीं कहती,
कि छलांग  लगा दो
मेरी धार में....
पर....
मेरा ,
बहना तो देखो!


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असम्भव नहीं है रे!
कहा उसने -'प्रेम';
वह बस
बोली -"मुश्किल तो है न प्रिये!"


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तुम मेरा
खोना
देखते रहोगे , और
बोलोगे तक नहीं .....
पर मेरे जाने के बाद
मेरे लिए
तुम्हारी एक सिसकी पर
बिलख उठूंगी मै.......


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तुम्हारी
मासूमियत पर शक नहीं,
शिकवा नहीं तुमसे मुझे
बस
ये समय का जख्म है
कि तुम
महसूस नहीं
कर सकते
और मै कहना नहीं चाहती!


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मेरी सीली यादो में
एकमात्र
नम लम्हा
तुम हो....
बस याद नहीं पड़ता है
कब, कहाँ भीगी थी??


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अब मै
पतंग नहीं रही
पर वो हैं  कि
डोर ही नहीं छोड़ते हैं ....


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ख़ामोशी का उसे
इतना हुनर क्यों है,
मासूम  मिजाजी का
 वो फनकार है क्योकर ,
HMm!!
वो कुदरत के ,
इत्मिनान की तस्दीक है,
उसे मोहब्बतों में रखना खुदा मेरे ,
गिला करुँगी वर्ना-
 उसकी पलके क्यों
 भीगी हैं ,नमी है
आखों में क्योकर.......


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पल - पल 
खो जायेगा ,
पर मै बचा लूंगी
लम्हें -लम्हें,
कतरे-कतरे 
स्मृतियों के ,
याद रखूंगी 
अभी घट रहे 
सारे मुक्तक ,
और फिर-फिर से लिखूंगी 
नयी विधा में पुरानी नज्में .


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कितना भी दे दोगे 
कम ही लगेगा..
रिश्तें हों नेह पगे 
तो  यही बस लगता है
दिया है -
'सबकुछ' के लिए 'कुछ नहीं'....
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