गुरुवार, 9 सितंबर 2010

क्यों मानू मै ,

क्यों मानू मै ,
नियति रुदन को ,
मेरे भी कुछ अरमा- सपने ;

नहीं चाहिए 
भ्रमित सहारे 
सब पहचाने कितने - अपने;

मुझसे प्रश्न 
करे हर कोई 
मै भी चाहू उत्तर अपने ;

तुम कहते हो 
रक्षा खातिर मेरी 
खीच रहे सीमाए ;

कैसे  मानू 
सत्य यही है ,
इसीलिए लक्ष्मण-रेखाए ;

मुझे आश्रय दिया सभी ने  
पर क्यों न मेरा घर कोई ;
यह न मेरा ,
वह न मेरा ,

यहाँ ' पराई'
वहा  'दूसरे घर' से आई ;

एक रेत कि नदी बनी मै ;
क्यों पग-पग पर 
ठोकर खाऊ ,
युगों -युगों से मौन रही मै 

क्यों अब भी मै चुप रह जाऊ ;

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