शनिवार, 25 सितंबर 2010

"तुम बादल की तरह ,
छा जाओ अगर .....
मै बरसना चाहूंगी ,
रिमझिम- रिमझिम......


तुम्हारी धूप के सिर्फ 
एक टुकड़े के लिए ,
रहता है ये भीगा  मौसम
गुमसुम-गुमसुम.........


हर खोते हुए लम्हे में 
तुम्हारे होने की तितली है,
और तितलियों के बगैर है 
व्यर्थ भ्रमरों की गुनगुन ."


मै बहकी सी कह रही थी ,
वक़्त ने मुझको झिंझोड़ा ,
और बस इतना कहा-
ओ मेरी पगली सुन-...


क्यों तुझे समझ नहीं 
आता है- बाज़ार है दुनिया 
बेमोल है यहाँ ख्वाबो की कदमताल 
और नेह की हर एक धुन.
एक टिप्पणी भेजें