शनिवार, 11 सितंबर 2010

मै कही , दूर चली आई हूँ -लगता है ,

मै कही दूर ,
चली आई हूँ-लगता है;
मै अपने ही किसी
कल की तन्हाई हूँ-लगता है;


एक सपने में हूँ  ,
खुश्क हकीक़त से डर लगता है ,
मै अपने खोये हुए ,
वक़्त क़ी भरपाई हूँ -लगता है;


मुझे अफ़सोस नहीं,क्योकर चली धूप में थी
उस दुशवार धूप में बनी थी 
जो मेरे संग-संग
मै वही परछाई हूँ - लगता है;


मेरा साकी , 
मेरे मयखाने में ही मेरा नहीं ,
जिंदगी का जाम पिए 
दिलो क़ी नरमाई हूँ- लगता है ;


किसी महफ़िल का 
तराना बनूँ,सोचा न था ;
आज पर दिलों के
दरवाजे क़ी शहनाई हूँ - लगता है;


प्रिय है मुझे बसंत ,
तितलियाँ,फूल बड़े प्यारे है;
मै उनकी सासों में 
घुलीमिली पुरवाई हूँ - लगता है;


अगर मै जिंदगी 
कहूं खुद को,ऐ खुदा;
मौत के जंगलो में
किस-कदर भरमाई हूँ - लगता है ;


तमाम उम्र हुई ,  
अजनबी हूँ , मै खुद से ;
ऐ  जिंदगी - न तुझको ,
न ही खुद को,समझ पाई हूँ-लगता है  .
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